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Help......is a great heart touching story

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     आकाश ट्रैन से उतरता ह तब काफी घनघोर बारिस हो रही होती हैं।तेज हवाओं के साथ बारिस सारे शरीर मे कंपकपी पैदा कर रही थी।चरों तरफ अँधेरा छाया हुआ था।ऐसा प्रतीत हो रहा था कि आज सारे दिन बारिश होगी।आकाश एक सेल्समेन था।टारगेट पूरा करने की चिंता उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी।वह जेब मे से पर्स निकाल कर देखता है।पर्स मे सिर्फ 500रूपये थे।आकाश को भूख कभी तेज लग चुकी थी।पर पर्स देखकर भूख दम तोड़ने लगी।मिडल क्लास लोगो को अपने लिए भी रूपये खर्च करने मे भी कितना सोचना होता है।इस बात को आकाश ही अच्छी तरह बता सकता था उस समय।कुछ समय में मन मे रूपये और भूख की जंग मे जीत रुपये की हुई।आकाश ने decide किया कि अभी सिर्फ चाय पी कर ही काम चलाएगा और रात को खाना।यह सोचकर आकाश सीधा होटल पर जाता है।चाय आर्डर करता है।चाय देने के लिए एक 12साल का लड़का आता है।उसका चेहरा लटका हुआ था।बचपन के खेलने कूदने के दिनों मे उसके हाथ मे चाय के कप पकड़ा दिए गए थे।वह आकाश के पास आता है और अपने मासूम चेहरे पर न चाहते हुए भी मुस्कान लाकर बोलता है साहब आपकी चाय जल्दी पी लीजिये नही तो ठंडी हो जायेगी।आकाश मुस्कुरा कर चाय ले लेता है।चाय की चुस्की लेने के बाद बोलता है-"छोटू तुम स्कूल नही जाते क्या।"छोटू-" जाता हूँ।साहब आज रविवार है,तो होटल पर सुबह ही आ जाता हूँ।नही तो स्कूल की छुट्टी के बाद रात के11 बजे तक यंही पर काम करता हूँ।घर पर माँ बाप कोई नही है।बस एक छोटा भाई है।वह तीसरी कक्षा मे पड़ता है।उसे डॉक्टर बनाना है।और मैं एक बहुत बड़ा इंजीनियर बनना चाहता हूँ"। आकाश - "शहबास छोटू मेहनत करो एक दिन जरूर कुछ बनोगे।" छोटू - धन्यवाद साहब । आकाश - छोटू तूम परेशान क्यों लग रहे हो।"  छोटू- साहब कल रात से मेरे भाई की तबियत बहुत ख़राब है।डॉ ने दवाइयाँ लिखी है।साहब मेरे पास खरीदने के लिए रुपये नहीं।मालिक से बोला तो उन्होंने देने से साफ मना कर दिया।आज दूसरी होटल पर ओवर नाईट ड्यूटी करूँगा।" कहने के बाद मुस्कुराता है।कितनी जिम्मेदारी इस छोटी सी उम्र मे उसकी मुस्कुराहट मज़क उड़ाती है इस समाज का और इस सिस्टम का जिसमें न जाने कितने छोटू अपने बचपन को भुलाकर चाय का कप पकड़ लेते हैं य अन्य काम करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। आकाश यही सोचता है।फिर अचानक उसके हाथ जेब मे जाते हैं और पर्स मे से 500 का नोट निकालकर छोटू के हाथों मे रख देता है और बिना कुछ कहे होटल से निकल जाता है।छोटू डबडबाई आँखों से आकाश को देखता रहता है।
         
   25 साल बाद एक नीलामी हो रही होती है एक घर की जिसके घर की नीलामी होती है।वही उस के दर्द को जनता है।जिस शख्स के घर की नीलामी हो रही थी।वह चुपचाप  अपने आशियाने को देखता है।यह वही आशियाना है जिससे बनाते बनाते कब बल सफ़ेद हो गए पता ही नही चला और आज उसी की नीलामी उफ़। चपचाप बैठे इस शख्स के अन्दर के तूफान का अंदाज़ा वही लगा सकता है।जो इस स्थिति से गुजरा हो।नीलामी सुरु होती है।बोली बढ़ती जाती है।जैसे -जैसे बोली लगती है वैसे ही दिल की धड़कन बढ़ती जाती है उस शख्स की आखिरकार एक नवयुवक बोली लगता है।और घर को खरीद लेता है।वह शख्स जिसका मकान था बहुत मायूस हो जाता है।घर के पेपर देने के लिए उसे बुलाया जाता है।जैसे ही वह नव युवक मकान मालिक को देखता है और थोड़ा सा चौकता है ।फिर घर के कागज ले लेता है। और मकान मालिक जिसका नाम आकाश था उससे बोलता है कि कल आप ये घर खाली कर देना।
             अगली सुबह आकाश अपना सारा सामान बांधकर घर छोड़ने की तैयारी म रहता है।सारा परिवार आकाश  उसकी पत्नी और दो बेटे बहुत मायूस चिंतित की अब वो कहाँ जायेगे कौन देगा उन्हें सहारा। इसी समय वही युवक जिसने घर ख़रीदा था। अपनी कार से आता है और आकाश के पैर छूकर बोलता है।पहचाना साहब मे वही छोटू हूँ जिसके भाई के इलाज के अपने रुपये दिए थे। आकाश पहचानने की कोशिश करता है ऐसी बीच वह युवक घर के पेपर आकाश के हाथों मे देता है।अपनी कार से तेजी से चला जाता है।आकाश की आँखों से आँसू बहते हैं और जुबान से सिर्फ एक ही शब्द निकलता है -"छोटू ।
             दोस्तों कितने ही छोटू हैं जिन्हें हमारी मदद की जरुरत है ताकि वो इतने काबिल बन सकें की वक्त आने पर हमारी और दूसरों की मदद कर सकें। कितने ही छोटुओं की प्रतिभा किसी होटल पर य भीख माँगने खो जाती है। आओ इन छोटुओं का बचपन और प्रतिभा निखारने की छोटी से कोशिश करें। 
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