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पत्नी किसकी ... Betal pachisi dusri story in hindi

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Betal pachisi dusri story in hindi


पत्नी किसकी ... Betal pachisi dusri story in hindi



विक्रम पुनः उसी शिंशपा-वृक्ष के नीचे पहुंचे। वहां चिता की
मटमैली रोशनी में उनकी नजर भूमि पर पड़े उस शव पर पड़ी जो धीरे-धीरे कराह
रहा था।

उन्होंने शव को उठाकर कंधे पर डाला और चुपचाप उसे उठाए तेज गति से लौट
पड़े।

कुछ आगे चलने पर शव के अंदर से बेताल की आवाज आई-"राजन ! तुम
अत्यंत अनुचित क्लेश में पड़ गए, अतः तुम्हारे मनोरंजन के लिए मैं एक कहानी
सुनाता हूं, सुनो।"

यमुना किनारे ब्रह्मस्थल नाम का एक स्थान है, जो ब्राह्मणों को दान में मिला
हुआ था। वहां वेदों का ज्ञाता अग्निस्वामी नाम का एक ब्राह्मण था। उसके यहां
मन्दरावती नाम की एक अत्यंत रूपवती कन्या उत्पन्न हुई। जब वह कन्या युवती
हुई, तब तीन कान्यकुब्ज ब्राह्मण कुमार वहां आए जो समान भाव से समस्त गुणों से
अलंकृत थे।

उन तीनों ने ही उसके पिता से अपने लिए कन्या की याचना की। कित कन्या के
पिता ने उनमें से किसी के भी साथ कन्या का विवाह करना स्वीकार नहीं किया
क्योकि उसे भय हुआ कि ऐसा करने पर वे तीनों आपस में ही लड़ मरेंगे। इस तरह
वह कन्या कुआंरी ही रही।

वे तीनों ब्राह्मण कुमार भी चकोर का व्रत लेकर उसके मुखमंडल पर टकटकी
लगाए रात-दिन वहीं रहने लगे।

एक बार मंदारवती को अचानक दाह-ज्वर हो गया और उसी अवस्था में उसकी
मौत हो गई। उसके मर जाने पर तीनों ब्राह्मण कुमार शोक से बड़े विकल हुए और
उसे सजा-संवारकर श्मशान ले गए, जहां उसका दाह-संस्कार किया।

उनमें से एक ने वहीं अपनी एक छोटी-सी मढैया बना ली और मंदारवती की
चिता की भस्म अपने सिराहने रखकर एवं भीख में प्राप्त अन्न पर निर्वाह करता हुआ
वहीं रहने लगा।

दूसरा उसकी अस्थियों की भस्म लेकर गंगा-तट पर चला गया और तीसरा योगी
बनकर देश-देशांतरों के भ्रमण के लिए निकल पड़ा।

योगी बना वह ब्राह्मण घूमता-फिरता एक दिन वत्रोलक नाम के गांव में जा
पहुंचा। वहां अतिथि के रूप में उसने एक ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया। ब्राह्मणद्वारा सम्मानित होकर जब वह भोजन करने बैठा, तो उसी समय एक बालक ने
जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। बहुत बहलाने-समझाने पर भी जब बालक चुप न
हुआ तो घर की मालकिन ने क्रुद्ध होकर उसे हाथों में उठा लिया और जलती हुई
अग्नि में फेंक दिया। आग में गिरते ही, कोमल शरीर वाला वह बालक जलकर राख
हो गया। यह देखकर उस योगी को रोमांच हो आया। उसने परोसे हुए भोजन को
आगे सरका दिया और उठकर खड़ा होते हुए क्रोधित भाव में बोला-"धिक्कार है
आप लोगों पर। आप ब्राह्मण नहीं, कोई ब्रह्म-राक्षस हैं। अब मैं तुम्हारे घर का
भोजन तो क्या, एक अन्न का दाना भी ग्रहण नहीं करूंगा।"
__योगी के ऐसा कहने पर गृहस्वामी बोला—"हे योगिराज, आप कुपित न हों। मैं
बच्चे को फिर से जीवित कर लूंगा। मैं एक ऐसा मंत्र जानता हूं जिसके पढ़ने से मृत
व्यक्ति जीवित हो जाता है।"

यह कहकर वह गृहस्थ, एक पुस्तक ले आया जिसमें मंत्र लिखा था। उसने मंत्र
पढ़कर उससे अभिमंत्रित धूल आग में डाल दी। आग में धूल के पड़ते ही वह बालक
जीवित होकर ज्यों-का-त्यों आग से निकल आया।

जब उस ब्राह्मण योगी का चित्त शांत हो गया तो उसने भोजन ग्रहण किया।
गृहस्थ ने उस पुस्तिका को बांधकर खूटी पर टांग दिया और भोजन करके योगी के
साथ वहीं सो गया। गृहपति के सो जाने के पश्चात् वह योगी चुपचाप उठा और
अपनी प्रिया को जीवित करने की इच्छा से उसने डरते-डरते वह पुस्तक खूटी से
उतार ली और चुपचाप बाहर निकल आया।

रात-दिन चलता हुआ, वह योगी उस जगह पहुंचा, जहां उसकी प्रिया का दाह हुआ
था। वहां पहुंचते ही उसने उस दूसरे ब्राह्मण को देखा जो मंदारवती की अस्थियां लेकर
गंगा में डालने गया था।

तब उस योगी ने उससे तथा उस पहले ब्राह्मण से, जिसने वहां कुटिया बना ली थी
और चिता-भस्म से सेज रच रखी थी कहा कि-'तुम यह कुटिया यहां से हटा लो
जिससे मैं एक मंत्र शक्ति के द्वारा इस भस्म हुई मदारवती को जीवित करके उठा लूं।"
___ इस प्रकार उन्हें बहुत समझा-बुझाकर उसने वह कुटिया उजाड़ डाली। तब वह
योगी पुस्तक खोलकर मंत्र पढ़ने लगा। उसने धूल को अभिमत्रित करके चिता-भस्म
में डाल दिया और मंदारवती उसमें से जीती-जागती निकल आई। अग्नि में प्रवेश
करके निकलते हुए उसके शरीर की कांति पहले से भी अधिक तेज हो गई थी।
उसका शरीर अब ऐसा लगने लगा था जैसे वह सोने का बना हुआ हो। इस प्रकार
उसको जीवित देखकर वे तीनों ही काम-पीडित हो गए और उसको पाने के लिए
आपस में लड़ने-झगड़ने लगे। जिस योगी ने मत्र से उसे जीवित किया था वह बोला
कि वह स्त्री उसकी है। उसने उसे मंत्र-तंत्र से प्राप्त किया है। दूसरे ने कहा कि तीर्थो
के प्रभाव से मिली वह उसकी भार्या है। तीसरा बोला कि उसकी भस्म को रखकर अपनी तपस्या से उसने उसे जीवित किया है, अतः उस पर उसका ही अधिकार है।

इतनी कहानी सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से कहा-“राजन ! उनके इस विवाद
का निर्णय करके तुम ठीक-ठीक बताओ कि वह स्त्री किसकी होनी चाहिए ? यदि तुम
जानते हुए भी न बतला पाए तो तुम्हारा सिर फटकर अनेक टुकड़ों में बंट जाएगा।"

बेताल द्वारा कहे हुए शब्दों को सुनकर राजा विक्रमादित्य ने कहा- "हे बेताल!
जिस योगी ने कष्ट उठाकर भी, मंत्र-तंत्र से उसे जीवित किया, वह तो उसका पिता
हुआ। ऐसा काम करने के कारण उसे पति नहीं होना चाहिए और जो ब्राह्मण उसकी
अस्थियां गंगा में डाल आया था, उसे स्वयं को उस स्त्री का पुत्र समझना चाहिए।
कित, जो उसकी भस्म की शैय्या पर आलिंगन करते हुए तपस्या करता रहा और
श्मशान में ही बना रहा, उसे ही उसका पति कहना चाहिए, क्योंकि गाढ़ी प्रीति वाले
उस ब्राह्मण ने ही पति के समान आचरण किया था।"

“तूने ठीक उत्तर दिया राजा किंतु ऐसा करके तने अपना मौन भंग कर दिया।
इसलिए मै चला वापस अपने स्थान पर ।" यह कहकर बेताल उसके कंधे से उतरकर
लोप हो गया।

राजा ने भिक्षु के पास ले जाने के लिए, उसे फिर से पाने के लिए कमर कसी
क्योंकि धीर वृत्ति वाले लोग प्राण देकर भी अपने दिए हुए वचन की रक्षा करते हैं।
तब राजा फिर से उसी स्थान की ओर लौट पड़ा जहां से वह शव को उतारकर लाया
था।

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