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Rahim ke dohe

Rahim ke dohe


 Contents                            


1.1 rahim ka jivan prichay

1.2 rahim ke prasiddh dohe



Rahim ke dohe


रहीम हिंदी काव्य एक प्रसिद्ध कवि हैं। उन्होंने अपने दोहों के माध्यम से जनजाग्रति का कार्य किया। रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम खाने खानाँ था। मुस्लिम होते हुए भी उन्होंने हिन्दू धर्म को भी अन्तर्मन की गहराई से स्वीकारा था इसकी झलक उनके साहित्य में देखने को मिलती है। उन्होंने अपने कई दोहों में हिन्दू देवी देवताओं का उदाहरण प्रस्तुत किया है। रहीम जी हिन्दू मुस्लिम भाई चारे की एक कड़ी थे। उनके दोहों में असामान्य ज्ञान और गहरे व्यवहारिक अनुभव का सुंदर संगम देखने को मिलता है। आज हम रहीम के प्रसिद्ध दोहे आपके साथ शेयर कर रहे हैं।


रहीम के प्रसिद्ध दोहे
Rahim ke prasidh dohe


1.

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछू न चाहिये, वे साहन के साह।। 1 

2.
छिमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
का रहिमन हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात।।2

3.
जे गरीब पर हित करें, ते रहीम बढ़ लोग।
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग।।3

4.
जैसी जाकी बुद्धि है, तैसी कहै बनाय।
ताको बुरा न मानिये, लेन कहाँ सो जाय।।4

5.
जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटि जाँहि।
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहीं।।5

6.
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग।।
Rahim ke dohe
रहीम के दोहे



7.
जो रहीम ओछो बढे, तौं अति ही इतराय।
प्यादे सो फरजी भयो, टेड़ों टेड़ों जाय।।7

8.
जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय ।
प्‍यादे सों फरजी भयो, टेढ़ों टेढ़ो जाय ।।

9.
देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन ।
लोग भरम हम पै धरें, याते नीचे नैन ।।9

10.
फरजी सह न ह्य सकै, गति टेढ़ी तासीर ।
रहिमन सीधे चालसों, प्‍यादो होत वजीर ।।10

11.
बड़े बड़ाई ना करैं, बड़ो न बोलैं बोल ।
रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मेरो मोल ।।11

12.

बड़े बड़ाई नहिं तजैं, लघु रहीम इतराइ ।
राइ करौंदा होत है, कटहर होत न राइ ।।12

13.
बड़े पेट के भरन को, है रहीम दुख बा‍ढ़ि ।
यातें हाथी हहरि कै, दयो दाँत द्वै का‍ढ़ि ।।13

14.
बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय ।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय ।।14

15.

बिपति भए धन ना रहे, रहे जो लाख करोर ।
नभ तारे छिपि जात हैं, ज्‍यों रहीम भए भोर ।।15

16.
भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघु भूप ।
रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखों तो एकै रूप ।।16

17.
मान सहित विष खाय के, संभु भये जगदीस।
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायो सीस ।।17

18.
यह रहीम निज संग लै, जनमत जगत न कोय ।
बैर, प्रीति, अभ्‍यास, जस, होत होत ही होय ।।18

19.
रहिमन उजली प्रकृत को, नहीं नीच को संग ।
करिया बासन कर गहे, कालिख लागत अंग ।।19

20.
रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत ।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत ।।20

21.
रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति ।
काटे चाटै स्‍वान के, दोऊ भाँति विपरीति ।।21

22.

रहिमन तीर की चोट ते, चोट परे बचि जाय ।
नैन बान की चोट ते, चोट परे मरि जाय ।।22

23.

रहिमन दुरदिन के परे, बड़ेन किए घटि काज ।
पाँच रूप पांडव भए, रथवाहक नल राज ।।23

24.
रहिमन थोरे दिनन को, कौन करे मुँह स्‍याह ।
नहीं छलन को परतिया, नहीं करन को ब्‍याह ।।24

25.

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि ।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि ।।25

26.

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय ।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय ।।26

27.
रहिमन धोखे भाव से, मुख से निकसे राम ।
पावत पूरन परम गति, कामादिक को धाम ।।27

28.
रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून ।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून ।।28

29.
रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय ।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय ।।29

30.
वे रहीम नर धन्‍य हैं, पर उपकारी अंग ।
बाँटनेवारे को लगे, ज्‍यों मेंहदी को रंग ।।30

31.
समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय ।
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछिताय ।।31

32.
समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक ।
चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक ।।32

33.
खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान ।
रहिमन दाबे ना दबैं, जानत सकल जहान ।।33

34.
जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय ।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय ।।34

35.
थोथे बादर क्वाँर के, ज्‍यों रहीम घहरात ।
धनी पुरुष निर्धन भये, करै पाछिली बात ।।35

36.
अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोऊ काम।
साँचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम ।।36

37.
करम हीन रहिमन लखो, धँसो बड़े घर चोर ।
चिंतत ही बड़ लाभ के, जागत ह्वै गौ भोर ।।37

38.
कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत ।
बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत ।।38

39.
संत संपति जानि कै, सब को सब कुछ देत ।
दीनबंधु बिनु दीन की, को रहीम सुधि लेत ।।39

40.
रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय ।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय ।।40




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